Friday, May 10, 2013

मुंबई ब्लास्ट.


मुंबई की सड़कों पर थी भीड़ भारी,
उसी में दौडभाग कर रहे थे जरदारी .
एक ओर,
 मुशरफ़ जख्मों पर छिड़क रहे थे नमक-पानी ,
तो दूसरी ओर बम लगा रहे थे गिलानी .
हमने कहा,"आश्चर्य है,अब तो पूरी टीम आ गयी "
" भारत-पाक एकता की बधाई हो बधाई."
उन्होंने  गुस्से में कहा,"भाड़ में जाये ऐसी एकता, 
 सकते में है पुरा पाकिस्तान और पूरी जनता".
"इंडिया में खुल गया है भ्रष्टाचार  का पिटारा
और गर्दिश में आ गया है अब  हमारा सितारा ".
और कहा,"    अबतक भ्रष्टाचार का ताज था हमारे पास
मगर मनमोहन की सरकार पहुँच ही गयी हमारे आसपास." 
"लेकिन अपना ताज बचाने,
                                 हम मारेंगे या मरेंगे 
आवाज़ से तो ये  कुम्भकर्ण जागने से रहा ,
            इसीलिए बमों के धमाके करेंगे " 
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और साथ में ललकारेंगे की ," अब तो उठ बावले,
                        जिंदगी में कभी तो कुछ कर ले,
                    यदि   तेरे देसी हथियार बेकार हो तो ,
                 हमारे made  in  america ही उठाले ".  
" अरे पृथ्वीराज चौहान की औलाद,
                                           अब तो जाग जा,
क्या हमें गजनी का महमूद बनाएगा ?
अपनी अस्मत बचा न पाया ,
क्या भारतमाता को भी लुटायेगा? "   
उनकी बात सुनकर बन्ध गयी मेरी घिग्गी ,
फिर भी बेशर्मी से करी हमने रीढ़ सीधी
अंत में हमने कहा,
       "मुशरफ़ जी आप भी क्यों हो मैदान में  ? 
आपको बड़ा यकीन है इंडिया से अभयदान में ?"
उन्होंने हँसते हुए कहा,
          "भई, हमने तो  कर लिया है पूरा हिसाब
       यहाँ तो सबसे सुरक्षित है सिर्फ "कसाब"
और    तो और हमको, please     भेजना      जेल तिहाड़
ताकि,कनिमोज़ी से लड़ायेंगे नैन और राजा संग करेंगे जुगाड़ !
                                                       opg  (  १९.०७.२०११) 
                                        (पिताजी के ६५ वे जन्मदिन पर )

Sunday, May 5, 2013

सरबजीत का सम्मान



         सरबजीत का सम्मान



 एक जनाज़ा धुमधाम से सज रहा था,
मुर्दा "सरबजीत",
               चंदन के लेप से नहा रहा था.                       
शाही बारात जैसे  जच रही थी अर्थी,
क्या नेता-क्या जनता कर रहे थे गर्दी.
एक ओर,
        मुर्दे की बेवा मुंह ताक रही थी.
अंतिम दर्शन के लिए,
           भीड़ में बगले झांक रही थी.
दुसरी ओर,
  "अमर शहीद"का लग रहा था नारा,
बेचैनी से बेटी देख रही थी नज़ारा.
जैसे ही,
   किसी नेता ने लगाया 'ज़िंदाबाद' का नारा,
       एकाएक मुर्दे का चढ गया  पारा.
एक हाथ से दिया उसने अर्थी को झटका,
तो दुसरे हाथ से उसने नेता को पटका.
पटकनी खाते ही नेता मिमियाने लगा,
और मुर्दा, भीड़ पर चिल्लाने लगा.
बोला,
   "शर्म करो शर्म करो मौत पर भीड़ जुटानेवालों,
     डूब मरो डूब मरो घडियाली आंसू बहानेवालों.”

आगे बोला,
    " अरे ! मेरी लाश पर न्यौछावर होनेवालों,
                             तुम पर शतश: धिक्कार है.
तहज़ीब की खोट है या तालीम की,
                              जो तुम्हें मुर्दों से प्यार है?”
जीते जी तो कुत्ता ना पूछा,
        आज एकाएक मैं कैसे पावन हो गया?
अब नेता भी छू रहा है जूता,
                         ये कैसा जीवन हो गया?



लेकिन सुनो मेरे दिल की बात,
'मुझे, चंदन-फूल या इत्र से नहाने का शौक नहीं,
और गरीब देश को,
                          मुर्दे पर साधन लुटाने हक़ नहीं.
अरे! करना ही है कुछ तो
                       करो ज़िंदा लोगों से  प्यार,
और 'सम्मान' के लिए ना करो,
                              किसी के मरने का इंतजार.


                   "पुष्पेय"ओमप्रकाश गोंदुड़े (03.05.2013)

(सरबजीत के अंतिम दर्शन के उपलक्ष में )