Wednesday, May 22, 2013

सोलहवां साल

                      सोवां साल
                                                 "पुष्पेय" ओमप्रकाश गोंदुड़े
                              31.03.13


एक दिन हम घुम रहें थे इंडिया गेट,
वहां एक बुजुर्ग नेता से हो गई भेंट.
सफेद कुर्ता,सिर पे टोपी और,
                हाथ में एक बँनर पकड़ा था.
'सोलहवा साल-करो गोलमाल'
                   बड़े अक्षरों में लिखा था.
हमने कहा,    “ नेताजी,ये कैसा शोर है?
80 की उम्र में क्यों, सोलहवें पर जोर हैं?”
नेताजी बोले,
" बेटा !कुछ पुराने पाप हैं,
  जिनको अब करना साफ हैं
कुछ मामलें अब भी उछल रहें है,
कुछ सपनों में आकर छल रहें हैं.
सोलहवें में कुछ भूल हो गई,
जो कांटों से बढकर शूल हो गई.
एक भूल,
 समझाती है 376 की धारा,
तो दुसरी,
लोकसभा में ना पिटवा दे दुबारा.
और पता नहीं,
           धमकी कब-कहां से आ  जाएं,
अचानक,
            कोई भूल बीवी ना बन जाएं.

 और पता नहीं,
 कब क्या लूट जाएगा इस लत में,
आजकल,
    बाप भी पैदा होते है अदालत में.

इसीलिए,
                          यह प्रावधान रहें,
ताकि,
         आनेवाला नेता सावधान रहें.
वैसे भी मेरी उमर तो गुजर गई,
           अब मेरा क्या जाएगा?
पर कम से कम,
  ' मेरा पोता तो  इन  झमेलों  से
                           बच जाएगा.”
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Monday, May 20, 2013

क़फन बाप का

                                             क़फन बाप का
Rajesh Khanna s last journey  65
  श्मशान में एक मुर्दा था पडा,                  
जिसने,
 Bombay Dying  का क़फन था ओढा.
जलाने के लिए लाए,
                     मैसूर से चंदन की लकडी,
कुछ थी सीधी और कुछ कुछ थी अकडी.
अर्थी के पास रखे थे छ्प्पन भोग,
आज 'हलवा-पुरी' का भी था योग.
मुर्दे ने पहना था दिग्जाम का कुर्ता,
                  और रेमण्ड की धोती.
सोलह इत्र कर रहे थे बंद,
                    टाटा-बिडला की बोलती.
बडका लगा रहा था माथे पर,
                                  लेप चंदन का.
आज उमड रहा था प्रेम,
                         जन्मों के बंधन का.
काशी से छुटका लाया,
                                 गंगा का नीर.
देख नज़ारा,
              गदगद हो गया मुर्दा शरीर.
जैसे ही पहनाने चले बाटा के शुज,
तो मुर्दा हो गया 'फुल-टु-कनफ्युज'.
जैसे ही करने चले दाह संस्कार,
एकाएक मुर्दे में हुआ प्राण संचार.


मुर्दा बोला,
बेटा,ये मेरे संस्कार है ?
                 या है 'अंत्य संस्कार' ?
या फिर किसी दबी खुशी का इजहार ?".
और बोला,
"बेटा,मुझे इतनी खुशी की आदत नहीं,
और छप्पनभोग देखने की ताकत नहीं.
और बेटा एक बात मुझे समझ ना आई,
कब समाप्त हुई हलवा-पुरी की लडाई ?
और वो तुम्हारी मजबुत और टिकाऊ रोटी,
                                  किथ्थे गई?
      जो मैंने  दो-दो दिन चबाई.
 आगे बोला,
'बेटा,कब मिटा धोती का कुर्ते से झगडा?
क्या Bombay Dying करेगा सीधा,
             शरीर मेरा जो थंड से अकडा ?'
और बेटा !एकाएक तेरी कैसे बदल गई सोच,
        कि पापा को नहीं आती जूते में मोच?
 बेटा! अब एक बार तो मुंह खोल दे,
मरे बाप के सामने तो सच बोल दे.
आंख का कांटा अब कैसे प्यारा हो गया?
और सूखा पेड कब से हरा हो गया?
   बेटा,   कहीं अब ये ऐसा तो नहीं,
कहीं,
 ये मेरे ही मौत का जलसा तो नहीं,
सच बता,
कहीं ये मेरे ही इंशुरंस का पैसा तो नहीं.

                     'पुष्पेय' ओमप्रकाश गोंदुडे
                              06.02.2013
                   (  image from google)

Friday, May 17, 2013

कथा: 'चंद सवाल'

                                          कथा: 'चंद सवाल'
                                                             'पुष्पेय' ओमप्रकाश गोंदुडे
                                                                  (चित्र गूगल से...साभार)  

                               

     एक राजा था.उसके चार दोस्त थे.एक व्यापारी,एक सैनिक,एक ज्ञानी (विद्वान) और एक किसान था.एक सुबह वे सभी शिकार के लिये एक घने जंगल में गये. घुमते घुमते वे काफी अंदर पहुंच गये.अचानक उन्हें एक सुवर्ण म्रूग दिखा.वह काफी खुबसूरत और आकर्षक था.देखते ही उन्हें लगा कि यह  मृग  उनके राज्य की शोभा बढा सकता हैं.राजा की आज्ञा पाकर वे सभी उसे पकडने के लिये चल पडे.  मृग  भी बहुत तेज था.वह भी जोरों से भागने लगा.जंगल,झाडी,नदी और पर्वत होते हुए वह भागते भागते एक गुफा के पास पहुंच गया.उसके पीछे भागते भागते बाकी लोग भी वहीं पहुंच गये.एकाएक जोरों की आवाज हुई और वह हिरण एक विशालकाय राक्षस में परावर्तीत हो गया. उसें देखकर राजा के सभी साथी डर गयें.राक्षस के डर से वे इधर उधर भागने लगे.मगर राक्षस ने उन्हें बन्दी बना लिया.इसी दौड-भाग में उनके जुते-चप्पल बिखर गये. इधर राजा भी अपने दोस्तों का इंतजार करने लगा.सुबह से शाम हो गई,शाम से  रात हो गयी,और फिर अगली सुबह.राजा अपने दोस्तों के इंतजार में थक चुका था.उसे अपने दोस्तों की चिंता होने लगी.
                             उसने निर्णय लिया ... अपने दोस्तों को ढुंढने का.बिना कोई समय गंवाए वह चल पडा...ढुंढने अपने दोस्तों को. ढुंढते ढुंढते वह भी उसीं रास्ते पर चल पडा हिरण के पैरों के निशानों के पीछे पीछे और जंगल,झाडी,नदी और पर्वत होते हुए वह भी उसी गुफा के पास पहुंच गया.उसे दोस्तों के जुते-चप्पल बिखरे हुए दिखें.देखते ही थोडा सहम गया.और तैय्यार भी हो गया अगली चुनौती के लिये ...... अपने म्यान से तलवार खींचकर.उसीपल उसके कानों में ठहाकों की आवाज गुंज पडी.और एक  विशालकाय राक्षस उसके सामने प्रकट हो गया.और बोला, "राजन, तुम्हारे  सारे दोस्त मेरे कब्जे में हैं". सुनकर राजा को गुस्सा आया. तलवार खींचकर राजा बोला,  "जिंदा रहना चाहते हो तो छोड दो मेरे दोस्तों को वर्ना युध्दके लिये तैय्यार हो जाओ". राक्षस बोला,”राजन, क्या हर समस्या युध्द से सुलझ सकती हैं? बुध्दी से भी हम सुलझा सकते हैं.मैं आपके दोस्तों को छोड भी सकता हूं, मगर... आपको मेरे चंद सवालों के जवाब देने होंगे.” राजा को उसकी बात  ठीक लगी.राजा ने उससे सवाल पूंछने को कहा.

             राक्षस ने पहला सवाल पूंछा, "इस दुनिया से भी भारी चीज क्या हैं?”

             राजा सोचने लगा.उसे अपने दादा की कहानी याद आई.उसके दादा एक राजा थे.मगर उनके दुष्ट सेनापति ने उन्हे राजगद्दी से हटा  दिया था.उन्हें गरीबी का बोझ झेलना पडा,जो उन्होने सह लिया.बहुत ज्यादा मेहनत करनी पडी,उसका भी बोझ सह लिया.दु:खों का बोझ भी सहना पडा,वह भी सह लिया.अपनी मेहनत के बुते उन्होने राजपाट वापिस पा लिया.मगर एक दिन आखेट करते करते उनके तीर से पानी पीते हुए शेर की बजाय,एक इंसान की मौत हो गई, जो उन्हें अंदर तक हिला गयी.उनका अंतरमन उसके पाप का बोझ सह नहीं पा रहा था.आखिर उन्होंने संसार से ही सन्यास ले लिया.सब कुछ त्याग दिया.
               अत: राजा ने गम्भीर वाणी से कहा, 'हे! राक्षसराज पाप का बोझ दुनिया से भी भारी हैं.' राजा के जवाब से राक्षस संतुष्ट हुआ.

                        राक्षस ने दुसरा सवाल पूंछा,'जल से पतला  क्या हैं?'.
राजा पुन: गहरे सोच में पड गया.उसे ध्यान आया कि जल कितना भी पतला क्यों न हो हर जगह नहीं पहुंच सकता मगर ज्ञान के भरोसें कहीं पहुंचा जा सकता हैं.राजा ने शांत मुद्रा में जवाब दिया कि जल से पतला ज्ञान हैं.उसके जवाब से राक्षस खुश हो गया.

                   राक्षस ने तीसरा सवाल पूंछा, 'अग्नि से भी तेज क्या हैं?'.
                राजा पुन: गहरे सोच में पड गया.राजा को अपने  प्रिय  मित्र की कहानी याद आ गई.उनका मित्र अपनी बारह वर्ष की मेहनत और कठीन साधना के कारण परम शक्तिशाली तथा बुध्दीमान था. एक बार वह अपनी ही अकड में जंगल से  घर जा रहा था.उसके पीछे से एक मुनि आ रहे थे. मुनि के बुलाने पर भी वह रूक नहीं रहा था.मुनि ने उसके पास जाकर  कहा,'राजन,इतना क्यों अकड रहे हो?दुनिया में तुमसे  शक्तिशाली तथा बुध्दिमान बहुत लोग हैं”.उसकी बातें सुनकर उस राजा को बहुत क्रोध आया.उसने क्रोध के चलते मुनि को धकेल दिया.मुनि का सर फुट गया था. मुनि ने उसे शाप दिया कि,' राजा ! जिस क्रोध के कारण तुने मुझे गिराअब वहीं क्रोध तुझे तेरी बुध्दि और शक्ति का प्रयोग कभी भी करने नहीं देगा'.एक पल में ही वह राजा निशक्त और लाचार हो गया.
    अत: राजा ने धीर वाणी में जवाब दिया कि,'क्रोध अग्नि से भी तेज हैं जो वर्षों की मेहनत और  ज्ञान को एक पल में जला सकता हैं'. राक्षस उसके जवाब से प्रसन्न हो गया था.

       फिर राक्षस ने अंतिम सवाल पूछ, दुनिया में सबसे ताकदवर चीज क्या हैं?”  

         राजा पुन: सोच में पड गया.उसे लगा सबसे  ताकतवर चीज तो किसी भी व्यक्ति या जीव का प्राण होना चाहिये. लेकिन राजा स्वयं अपने प्राणों का भय छोडकर राक्षस से लडने को तैयार हो गया था... मगर क्यों? क्योंकि उसे अपने दोस्तों से.... अपनी प्रजा से प्यार हैं.
         अत: राजा पुन: शांत स्वर में जवाब दिया कि “दुनिया में सबसे ताकदवर चीज प्यार हैं.”

राक्षस उसकी बातों से गदगद हो गया.और बोला कि,'राजा मैं तेरे जवाबों से खुश हुआ हूं और उसीकारण तेरे किसी भी एक दोस्त छोड सकता हूं.बोलो किसे छोडना हैं?' राजा पुन: धर्मसंकट में पड गया.कुछ देर सोचने के पश्चात राजा ने कहा कि, 'हे राक्षस राज मेरे किसान दोस्त को छोड दो.' राक्षस ने कारण जानना चाहा.
                तब राजा गम्भीर मुद्रा में बोला, “हे राक्षस !पहले मैं सैनिक को मागंना चाहता था क्योंकि वह मेरी रक्षा करता हैं,मगर भूख लगने के बाद शायद मेरी तो क्या,स्वयं की भी रक्षा नहीं कर पायेगा.उसीतरह ज्ञानी मुझे हमेशा अच्छी बातें सिखाता हैं,मुझे मार्ग से भटकने नहीं देता मगर भूख लगने पर वह भी लाचार हो जायेगा.”


       अंत में राक्षस ने पूछा, 'आप तो व्यापारी को भी मांग सकते थे?'
तब राजा बोला, “व्यापारी तो हमें पैसा ला देता उसीके भरोसें हमारी अर्थव्यवस्था हैं मगर वह भी भूखे पेट  कुछ काम करने लायक नहीं रहेगा.मगर किसान सबकी भूख मिटा सकता हैं.मुझे मेरे सभी मित्र एक समान प्यारे हैं.लेकिन सिर्फ एक किसान के भरोसें मैं कई सैनिक,कई व्यापारी और कई विद्वान या ज्ञानी तैय्यार कर सकता हूं.”
                    राजा की बातें सुनकर राक्षस अति प्रसन्न हुआ.और हंसते हुए बोला कि,'राजन !मैं एक समस्या हूं,हर जगह अपने लिये घर तलाशता हूं लेकिन तुम बुध्दीमान हो और हर समस्या की जड तक पहुंचते हो.इसीलिये  तुम्हारें राज्य में मेरे लिये कोई स्थान नहीं हैं. मैं जा रहा हूं यहाँ से  हमेशा के लिये ....अपना नया आशियाना तलाशने .'  और फिर सभी मित्र आजाद हो गये और सकुशल अपने राज्य वापिस आ गये.

          
                                    (भारत के महान संतों  वाणी  से प्रेरित और किसान को समर्पित  )
                                                 समाप्त.



Thursday, May 16, 2013

नई राह


                  
                         नई राह


वह रिटायर हो चुका था......चार साल पहले.बड़ी-सी कोठी थी उसकी........ जिसमें एक शानदार  बगिया आबाद थी. मगर इस आलिशान जगह में यदि उसका कोई साथ निभा रहा था तो वह थी उसकी तनहाई...... खामोश तनहाई. बीवी को गुजरे तो तीस साल हो चुके थे.........जब उसका रघू मात्र तीन साल का था. उसकी परवरिश में वह कब बाप से मॉं बन गया खुद उसे पता न चला.दफ्तर में वह अपनी कर्मठता और ईमानदारी के लिए जाना जाता था.रघू की पढाई और बचपन संभालते-संभालते कब वह पचपन पहुंच गया खुद भी न जान सका. लेकिन जब तक पता चलता तब तक एक दस्तक हो चुकी थी ... मधुमेह और हृदय रोग की दस्तक.रघू की नौकरी लगते ही अपनी तबीयत पर ध्यान देने की उसकी दीर्घगामी योजना थी.वैसे भी उसे रिटायरमेंट के बाद पेंशन नहीं मिलती थी और PF का बहुतांश पैसा बच्चे की पढ़ाई और घर बनाने में खर्च हो चुका था.तबीयत की योजना कार्यान्वित हो इसके पहले ही रघू इंजिनीयर बनकर अमेरिका में बस चुका था......अपनी अमेरिकन मेम के साथ..... हमेशा के लिए.
                                               एकाएक उसका जीवन पुन: खाली हो चुका था.कुछ ही चीजें अपना कहने के लिए बची थी........  रिटायरमेंट,तनहांई और अपना पांव पसार कर हाजरी देती हुई मधुमेह और हृदयरोग नामक दो बीमारियां.
                                          
                                 26/11 के ब्लास्ट के बाद मुंबई काफी बदल चुकी थी.आतंकी कसाब का इलाज मशहूर अस्पताल 'नानावती' में सरकारी खर्चें पर चल रहा था...... जबकि फांसी की सज़ा उसे मुकर्रर हो चुकी थी.इधर घटना के बीस साल बाद जब तक बाबरी मस्जिद मामले में कोर्ट का फैसला आ चुका था तब तक अधिकांश आरोपियों की कुदरती मौत हो चुकी थी.अवैध हथियार रखने के आरोप में संजय दत्त को साढ़े तीन साल की सज़ा का ऐलान हो चुका था .......... वह भी घटना के बीस साल बाद.

                      कल रातभर उसे नींद नहीं आई थी....... कुछ खयालों में उसकी रात बीत गई.मगर सुबह उसे काफी सुहावनी लग रही थी...... उसकी आंखे भी चमक रही थी.शायद उसकी नई जिंदगी का आगाज़ होनेवाला था....... या उसे नई राह मिल गई थी शायद.

                                                             अगली सुबह उसने अपनी कोठी अनाथाश्रम को दान कर दी.और निकल पड़ा वह एक पुख्ता योजना के साथ......बम से उड़ाने की योजना.... बोरिवली स्टेशन उड़ाने की योजना. और साथ में एक और योजना पर वह काम कर रहा था.........सुरक्षीत पकड़े जाने की योजना ताकि उसका भी इलाज  'नानावती अस्पतालमें हो सके जो यकिनन उसके हैसियत से बाहर था.उसको यकीन था कि जेल में अन्य क़ैदियों का साथ उसकी तनहांई का भी इलाज करेगा. और वैसे भी वह बीस साल और जी पाएगा यह उसें उम्मीद नहीं थी.....

                                                                                  पुष्पेय 'ओमप्रकाश गोंदुड़े'

                                                                                   ( चित्र गूगल से .....साभार )
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Friday, May 10, 2013

मुंबई ब्लास्ट.


मुंबई की सड़कों पर थी भीड़ भारी,
उसी में दौडभाग कर रहे थे जरदारी .
एक ओर,
 मुशरफ़ जख्मों पर छिड़क रहे थे नमक-पानी ,
तो दूसरी ओर बम लगा रहे थे गिलानी .
हमने कहा,"आश्चर्य है,अब तो पूरी टीम आ गयी "
" भारत-पाक एकता की बधाई हो बधाई."
उन्होंने  गुस्से में कहा,"भाड़ में जाये ऐसी एकता, 
 सकते में है पुरा पाकिस्तान और पूरी जनता".
"इंडिया में खुल गया है भ्रष्टाचार  का पिटारा
और गर्दिश में आ गया है अब  हमारा सितारा ".
और कहा,"    अबतक भ्रष्टाचार का ताज था हमारे पास
मगर मनमोहन की सरकार पहुँच ही गयी हमारे आसपास." 
"लेकिन अपना ताज बचाने,
                                 हम मारेंगे या मरेंगे 
आवाज़ से तो ये  कुम्भकर्ण जागने से रहा ,
            इसीलिए बमों के धमाके करेंगे " 
\
और साथ में ललकारेंगे की ," अब तो उठ बावले,
                        जिंदगी में कभी तो कुछ कर ले,
                    यदि   तेरे देसी हथियार बेकार हो तो ,
                 हमारे made  in  america ही उठाले ".  
" अरे पृथ्वीराज चौहान की औलाद,
                                           अब तो जाग जा,
क्या हमें गजनी का महमूद बनाएगा ?
अपनी अस्मत बचा न पाया ,
क्या भारतमाता को भी लुटायेगा? "   
उनकी बात सुनकर बन्ध गयी मेरी घिग्गी ,
फिर भी बेशर्मी से करी हमने रीढ़ सीधी
अंत में हमने कहा,
       "मुशरफ़ जी आप भी क्यों हो मैदान में  ? 
आपको बड़ा यकीन है इंडिया से अभयदान में ?"
उन्होंने हँसते हुए कहा,
          "भई, हमने तो  कर लिया है पूरा हिसाब
       यहाँ तो सबसे सुरक्षित है सिर्फ "कसाब"
और    तो और हमको, please     भेजना      जेल तिहाड़
ताकि,कनिमोज़ी से लड़ायेंगे नैन और राजा संग करेंगे जुगाड़ !
                                                       opg  (  १९.०७.२०११) 
                                        (पिताजी के ६५ वे जन्मदिन पर )

Sunday, May 5, 2013

सरबजीत का सम्मान



         सरबजीत का सम्मान



 एक जनाज़ा धुमधाम से सज रहा था,
मुर्दा "सरबजीत",
               चंदन के लेप से नहा रहा था.                       
शाही बारात जैसे  जच रही थी अर्थी,
क्या नेता-क्या जनता कर रहे थे गर्दी.
एक ओर,
        मुर्दे की बेवा मुंह ताक रही थी.
अंतिम दर्शन के लिए,
           भीड़ में बगले झांक रही थी.
दुसरी ओर,
  "अमर शहीद"का लग रहा था नारा,
बेचैनी से बेटी देख रही थी नज़ारा.
जैसे ही,
   किसी नेता ने लगाया 'ज़िंदाबाद' का नारा,
       एकाएक मुर्दे का चढ गया  पारा.
एक हाथ से दिया उसने अर्थी को झटका,
तो दुसरे हाथ से उसने नेता को पटका.
पटकनी खाते ही नेता मिमियाने लगा,
और मुर्दा, भीड़ पर चिल्लाने लगा.
बोला,
   "शर्म करो शर्म करो मौत पर भीड़ जुटानेवालों,
     डूब मरो डूब मरो घडियाली आंसू बहानेवालों.”

आगे बोला,
    " अरे ! मेरी लाश पर न्यौछावर होनेवालों,
                             तुम पर शतश: धिक्कार है.
तहज़ीब की खोट है या तालीम की,
                              जो तुम्हें मुर्दों से प्यार है?”
जीते जी तो कुत्ता ना पूछा,
        आज एकाएक मैं कैसे पावन हो गया?
अब नेता भी छू रहा है जूता,
                         ये कैसा जीवन हो गया?



लेकिन सुनो मेरे दिल की बात,
'मुझे, चंदन-फूल या इत्र से नहाने का शौक नहीं,
और गरीब देश को,
                          मुर्दे पर साधन लुटाने हक़ नहीं.
अरे! करना ही है कुछ तो
                       करो ज़िंदा लोगों से  प्यार,
और 'सम्मान' के लिए ना करो,
                              किसी के मरने का इंतजार.


                   "पुष्पेय"ओमप्रकाश गोंदुड़े (03.05.2013)

(सरबजीत के अंतिम दर्शन के उपलक्ष में )