Friday, June 28, 2013

खास चेला


                                     खास चेला
             'पुष्पेय' ओमप्रकाश गोंदुड़े


वह एक नई सोच लेकर आया था पार्टी में....... एकदम धार के विपरीत।पार्टी के बुजूर्ग नेता खुद को महाबली कर्ण समझते थे......फरक बस इतना था कि कर्ण कवच-कुंडल लेकर आया था और ये लोग कुर्सी।उसने परिवर्तन को आवाज दी थी।उसने परिवारवाद और भाई-भतीजावाद के सिध्दांत को भी ललकारा था....पूरे जोर से।शीर्ष नेताओं ने उसका मुखर विरोध किया था मगर युवा कार्यकर्ता उसकी शक्ति थे और वह उनकी आवाज।
                         लोग उसे अब नेताजी कहने लगे थे।उसका कद पार्टी में बढने लगा था और और उसके चेले भी।उसने अपना एक खास चेला भी बनाया था जिसे उसने दहाड़ना भी सिखा दिया था।खास चेला अपने नेताजी के लिए सिढ़ीया गढ़ रहा था और रास्ता भी साफ कर रहा था....धडल्ले से.... बेपरवाह होकर...बिना रोक-टोक के।उसे अपने नेताजी का वरदहस्त प्राप्त था।

                               साल दर साल लोकसभा में पार्टी की हैसियत बढ़ रही थी .......मगर अबतक उसे सत्ता का स्वाद नसीब नहीं हुआ था।समय के साथ सबकी उम्र बढ़ रही थी.....नेताजी की भी।कुछ चेले अब नेताओं की श्रेणी में आ चुके थे और खास चेला बड़े नेता की।उसका खास चेला उसके ही नक्शे कदम पर चल कर चमक रहा था..... सूर्य की तरह, और आग भी उगल रहा था सूर्य की ही तरह।

                              इधर लोकसभा का चुनावी बिगूल बज चुका था।सत्तापक्ष भ्रष्टाचार की गर्त तक पहुँच गया था।महंगाई आम जनता की कमर तोड़ चुकी थी।अब तो चुनावी सरगर्मी शुरू हो गई थी।उसे पुन: सत्ता की कुर्सी के सपने आने लगे। एकाएक परिवर्तन की बयार बहने लगी थी।आज चेले उसके दरवाजे पर पहुँचे थे.....बैंडबाजा लेकर......मिठाई लेकर....और फूलों का हार लेकर।वह अंदर ही अंदर गुदगुदा रहा था.....नाच रहा था।सत्ता की कुर्सी उसकी ओर सरकने लगी थी।वह भी कदम बढ़ा रहा था.....अब कुर्सी एकदम उसके करीब थी।उसे तो बस अब बैठना ही था।उसकी आखों में उसके संघर्ष के दिनों से लेकर अबतक के दृश्य एक चलचित्र की तरह घुम रहे थे.....उसकी आंखों से आंसू भी बहने लगे थे...खुशी के।उसके कानों में उसके ही जयनाम के नारे गूँज रहे थे और वह उसका आनंद ले रहा था....कि एकाएक उसका खास चेला आया....उसने नेताजी को मिठाई खिलाई।नेताजी ने उसे अपने गले लगाया और अपने हाथों से उसे मिठाई भी खिलाई।जैसे ही नेताजी ने खास चेले को मिठाई खिलाई....उसने भाव विभोर होकर नेताजी के पैर छूए और धम से उसी कुर्सी पर बैठ गया।नेताजी कुछ समझ पाते उसके पहले ही "नए नेता की जय-नए नेता की जय" के नारे आसमान में गूँजने लगे और नेताजी एकाएक एक बुजूर्ग नेता की तरह आसमान ताकने लगे।

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Wednesday, June 19, 2013

बेटी


           बेटी

मेरी भी एक बिटीयां होती,
          ख्वाब बुनती परियों सा l
पंख लगाकर उडाती हमें,
            सैर कराती परिदों सा l

परदे चहकते,दीवारें बोलती,
             घर सजता महल सा l
तुलसी हंसती,अल्पनाएं बसती,
        आंगन नाचता मोर सा l

दीप जलाती आंगन में,
     ओज फैलाती दीवाली सा l
खुद भी गाती,घर से गवाती,
           तार छेडती सरगम सा l

अब जाग भी जा 'पुष्पेय',
          मत बइठ उदास सा l
तेरी भी बहु आएगी,
         अहसास देगी बेटी सा l


                                   'पुष्पेय'ओमप्रकाश गोंदुड़े

Saturday, June 15, 2013

लोकतंत्र की अर्जी


                    लोकतंत्र की अर्जी

सरकारी कार्यालय के पास एक शख्स पडा था ,
आन्ख थी फुटी और कानों पर ताला जडा था.
खून से सना था मुंह,
                                 और कटी हुई थी जिव्हा .
सीले हुए नाक से ,
                 ना ले पा रहा था सांस,ना हवा.
हाथ में थी पर्ची,
                                    जिसमें कुछ लिखा था.
पर्ची साहाब तक पहुंचे,
                      तब तक वह उपर जा चुका था.
अचानक हुआ धमाका,
              और उसके शरीर से निकली आत्मा.
डर गया मैं और कान्प गया,
                                  याद आ गया परमात्मा.
डरते डरते हमने कहा (आत्मा से),
                                    ' ये तेरा कैसा साज हैं?
आंख नाक मुंह और,
                                    चिठ्ठी का क्या राज हैं.'
जवाब आया,"ना तंत्र हूं,ना मंत्र हूं,
                                       मैं तो लोकतंत्र हूं.”  
'निर्बल हूं, अपाहिज़ हूं,         
                                    फिर भी ना स्वतंत्र हूं.'
और कहते हैं,  "जैसे देखा और सुना,
                              मैंने भ्रष्टाचार का मामला ,
फोड दी आंख मेरी,
                             और जडा कानों पर ताला.
और जैसे ही मैंने बोलना चाहा,
           सील दिया नाक और काट दी जिव्हा.
ताकि बढता रहे भ्रष्टाचार,
                              और ना बहे विरोधी हवा.”
और आगे बोले,
                         "इसीलिये मैं लाया हूं पर्ची,   
                   जिसमें हैं मेरी छोटी सी अर्जी.

आंख मुंह तो फोड दिया,
                          अब हाथ-पाव भी तोड दो,
फिर भी जी ना भरे,
                          तो मेरी छाती भी चीर दो.
पर सरकार,
                                     मैं तो लोकतंत्र हूं,
कम से कम,
                          एक बार तो सांस लेने दो.” 


                पुष्पेय 'ओमप्रकाश गोंदुड़े'

Sunday, June 9, 2013

हाँ ! मैंने देखी है यशोदामाई

                                                 हाँ ! मैंने देखी है यशोदामाई





  मरुस्थल में तूने
                             की सिंचाई,
 कपोलों से जो
                     तूने वृक्ष बनाई.
        हाँ ! मैंने देखी है यशोदामाई.


 गोदी का तूने
                   बिछोना बनाई,
 आंचल से तेरे
                     बनी रजाई.
        हाँ ! मैंने देखी है यशोदामाई.


 ट्रेन से गिरकर भी,
                    मेरी जान बचाई.
 'वैनगंगा' की धार से,
                मुझे बचाकर लाई.
 हाँ ! मैंने देखी है यशोदामाई.


  मेरी हर सांस,
                   तेरी ही रहनुमाई.
 क्यों चुपचाप सही,
                   तू मेरी बेवफाई.
 हाँ ! मैंने देखी है यशोदामाई.


 ये हमारा मुक़द्दर,
              या खुदा की खुदाई.
 हाँ ! तुझे देखकर ही,
          उसने ममता बनाई
हाँ ! मैंने देखी है यशोदामाई.


        'पुष्पेय' ओमप्रकाश गोंदुड़े




Tuesday, June 4, 2013

पुष्पेय: शुध्द ना होगा वातावरण, तो होगा मानवता का मरण ॥

पुष्पेय: शुध्द ना होगा वातावरण, तो होगा मानवता का मरण ॥:           वातावरण राम रहीम की औलाद हो तुम ,                आ जाओ प्रकृति की शरण । शुध्द ना होगा वातावरण ,                तो ह...

शुध्द ना होगा वातावरण, तो होगा मानवता का मरण ॥


          वातावरण

राम रहीम की औलाद हो तुम,
               आ जाओ प्रकृति की शरण ।
शुध्द ना होगा वातावरण,
               तो होगा मानवता का मरण ॥

बना लो चाहे अट्टालिकाएं,
           या चाहे कर लो लक्ष्मी का वरण।
प्यार बांटों,पैसा बांटों,
                या चाहे बनो दानवीर करण ।
अहं हटाओ,लोभ मिटाओ,
            या  करो काम-क्रोध का हरण।
शुध्द ना होगा वातावरण,
               तो होगा मानवता का मरण ॥1


दुध पिलाओ,मेवा खिलाओ,
     या करो बोर्नविटा से पोषण-भरण ।
'जिम' भेजो, अखाड़ा भेजो,
    या भेजो किसी पहेलवान की शरण ।
मंदिर जाओ,मस्जिद जाओ,
             या थामो किसी गुरू के चरण ।
शुध्द ना होगा वातावरण,
               तो होगा मानवता का मरण  ॥2



लाघूं समुंदर,छू लू आसमां,
     या और कुछ हो जीने का कारण ।
तय करता एक सांस का फासला,
                          जीवन है या मरण ।
सब तो फिर 'एक शून्य' है,
                    जब दूषित हो पर्यावरण ।
 शुध्द ना होगा वातावरण,
               तो होगा मानवता का मरण ॥3

                         'पुष्पेय'ओमप्रकाश गोंदुड़े
                          05.06.2013
                                (विश्व पर्यावरण दिवस)
                               (चित्र साभार गूगल से) 
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